इंसानियत को शर्मशार करती रेलवे। क्या ये इंसानियत को दर्शाता है? मुझे तो शर्म आ गयी ये देख कर। आज लगभग हर ट्रेन के हर जनरल डब्बे का अक्सर तौर पे यही हाल है। इंसान की दशा / हाल आज भी इतना गिरी हुई है, के वो जानवरो से बदतर हाल में जी रहा है, वो भी पैसे देकर। वो अपने खून - पसीने बहा कर जो कमाया, उसे देकर अपने सफ़र को निकला, पर हमारे आज़ाद देश में, जहा बुलेट ट्रेन चलाने की बात की जा रही है, वहा इस हाल में सारी रात और दिन , ठण्ड और भरी गर्मी में, जानवरो से बदतर इस हाल में गिर-पड़ कर, खड़े होकर या दब दब कर और ट्रेन की गन्दी फ्लोर पर सोने को मजबूर , और इस तरह वो, टीकट लेकर भी भेड-बकरियो से भी बुरी हाल में अपना सफ़र गुज़ारने को मजबूर है। और शराफत देखो इनकी मासूमियत भी, के इतने पर भी ऐसी दूर-व्यवस्था के खिलाफ, कोई शिकायत नहीं करते। खामोशी से सब झेलते हुए इस दयनीय स्तिथि में भी चुपचाप अपना सफ़र तय कर लेते है। किन्तु क्या ये सब अच्छा हो रहा है? क्या आप अपने साथ ये स्तिथि मंज़ूर करेंगे? आप अपने बच्चों के साथ या बूढ़े माँ-बाप या गर्भवती महिला के साथ ऐसे हाल में सारी रात और ठण्ड में...