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इंसानियत को शर्मशार करती रेलवे।

इंसानियत को शर्मशार करती रेलवे।




क्या ये इंसानियत को दर्शाता है?

मुझे तो शर्म आ गयी ये देख कर।
आज लगभग हर ट्रेन के हर जनरल डब्बे का अक्सर तौर पे यही हाल है।
इंसान की दशा / हाल आज भी इतना गिरी हुई है,
के वो जानवरो से बदतर हाल में जी रहा है, वो भी पैसे देकर।
वो अपने खून - पसीने बहा कर जो कमाया, उसे देकर अपने सफ़र को निकला, पर हमारे आज़ाद देश में,
जहा बुलेट ट्रेन चलाने की बात की जा रही है,
वहा इस हाल में सारी रात और दिन , ठण्ड और भरी गर्मी में,
जानवरो से बदतर इस हाल में गिर-पड़ कर, खड़े होकर या दब दब कर और ट्रेन की गन्दी फ्लोर पर सोने को मजबूर , और इस तरह वो, टीकट लेकर भी भेड-बकरियो से भी बुरी हाल में अपना सफ़र गुज़ारने को मजबूर है।

और शराफत देखो इनकी मासूमियत भी,
के इतने पर भी ऐसी दूर-व्यवस्था के खिलाफ, कोई शिकायत नहीं करते।

खामोशी से सब झेलते हुए इस दयनीय स्तिथि में भी चुपचाप अपना सफ़र तय कर लेते है।

किन्तु क्या ये सब अच्छा हो रहा है?
क्या आप अपने साथ ये स्तिथि मंज़ूर करेंगे?

आप अपने बच्चों के साथ या बूढ़े माँ-बाप या गर्भवती महिला के साथ ऐसे हाल में सारी रात और ठण्ड में ऐसे सफ़र कर पाएंगे?
वो भी पैसो की टिकट खरीद कर ?


क्या ये तरीका सही है?
क्या इस तरह से आप सफ़र कर सकते ?

अगर नहीं, तो सीर्फ कुछ पैसे कम देकर,
ये इंसान ऐसे क्यों मजबूर है,
इतना परेशान होने?
आखिर कहा गयी इंसानियत ?

किसी इंसान की कोई इज़्ज़त नहीं?
इतने बदतर गुलामो से हाल में,
हम कुत्तो को भी गाड़ी में ऐसे नहीं भरते,
और ये पैसे लेकर इंसानो के लिए ये इंतेज़ाम....

क्यों दर्द नहीं होता इंसान को इंसानो की ऐसी हालत देख कर?
क्या हमारे अंदर इंसानियत मर गयी?
अगर हां,
तो क्या हम इंसान है?

आखिर आपके टैक्स का पैसा जा कहाँ रहा है?

ये चित्र (picture) आप देख रहे है,
ये सारनाथ एक्सप्रेस के जनरल कोच (डब्बे) का है जो दुर्ग जंक्शन से ही शुरू होती है और ये हाल बस वही से और ये चित्र बिलासपुर के पास लिया गया है।

किन्तु ये दशा लगभग हर ट्रेन के हर जनरल बोगी की होती है और लगभग हमेसा।


Solution- क्या जितनी टिकट बेचीं जाती है, उतनी सीटो का इंतेज़ाम नही किया जाना चाहिए?

अगर पहले से नहीं हो, तो हर बड़े स्टेशनों में ट्रेन की बोगियां खड़ी होती है,
उन्हें वहां से नहीं जोड़ दिया जाना चाहिए?

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