विकास क्या है ?
क्या पक्की सड़क और हर तरफ सड़क बनते रहना, और सालो साल बस बनते ही रहना।
काम पूरा ले दे के हो भी गया तो फिर उसमे जगह जगह गड्ढे या बनते ही पाइप बिछाने फिर खोदना ?
क्या सिर्फ बिल्डिंगें बनते रहना और जंगल, पेड़ - पौधें और पक्षियों - जानवरो का गायब होते जाना ?
क्या है विकास?
क्या बड़े बड़े कुछ चुनिंदा हॉस्पिटल, जिनमें इलाज कराने अक्सर आबादी के पास पैसे नहीं होते, और लोग वहां जाकर ये महसूस करते हैं के वो इंसान ही नहीं, ऐसा बर्ताव झेलते है जो अपने गांव में वो जानवर से भी कभी करने का नहीं सोच सकते बल्कि पाप समझते है।
या नेताओ के बड़े बड़े वादे और भाषण जिनके खूब अच्छे अच्छे प्यारे सपने होते है, या देश का गौरव बताए जाने वाली वो बड़ी बड़ी कंपनिया जिनपर हमें देश भक्त होने के नाते गर्व करने को कहा जाता है, जिनके मालिक कई सौ करोड़ के जहाज अपनी बीवियों को घूमने तोहफा देता है, हजारों करोड़ के सिर्फ घर में रहते और जहाज ने उड़ कर दफ्तर आते जाते है,
और देश के करोड़ों लोग और बच्चे उनके ही शहर में भूके सोते , नंगे घूमते , रास्तों पे रहते है, सड़क पार करते हुए और कई बार किनारे पर ही बड़ी गाडियां आकर उन्हें रोंड देती है जैसे वो सड़ा फेका हुआ टमाटर हो।
ये कंनियां गरीब मजदूरों, किसानों, जरूरतमंदो को कुछ नहीं देती,
है कभी जब थोड़ा बहुत दिखाना ज़रूरी होजाए या टैक्स बचने कुछ दान दिखाना हो तो दस देकर हजार दिखा के कई बचा लेती है।
या देती है! कभी सरकारी ज़मीन फोकट या कौड़ियों के दाम लेने, कुछ लोगो को खून चूसने वाली किमत पर नौकरी और साथ प्रदूषण, ज़हरीली हवा, गंदी बीमारियां फैलाने प्रदूषित पानी और ज़मीन भी प्रदूषित जिससे वो कुछ उगाने के काबिल नही रहती और आगे चलकर यहां भूस्खलन, खास कर खदानों की वजह से ।
क्या बड़ी बड़ी फिल्में जो सिर्फ हराम की कमाई हुई दौलत से ही अब देखना मुमकिन है पर्दे पर या गरीब के कई दिन की कमाई की बरबादी है, जिसमें बुराई देखकर अलग बड़ा अफ़सोस और सहानुभूति दिखाते है, लेकिन बाहर निकलते ही खुद वहीं ज़ुल्म और बुराई खुद करते है। ये विकास है ?
जिन फिल्मों को देख कर कर और बुरे लोग तो उससे बुराई का आइडिया लेकर और ऐसे हथकंडे अपनाने लगते है, ना कोई ये सीख रहा है इक्का दुक्का को छोड़कर, के बुराई का बुरा अंत ही होता है और ना कोई जागरूकता फैल रही है। बल्कि समाज और गुमराह होरहा है जैसे कि लोग अब कानून को खेल मज़ाक समझते है, इंसान का खून बहाना, और चोट पहुंचाना एक खेल और बहादुरी लगने लगा है लोगो को, भीड़ द्वारा किसी आरोपी की पीट पीट कर हत्या तक कर दी जाती है। क्या यही विकास है ?
और ऐसे किसी फिल्म, या संदेश/message से जो गुमराह होजाते है,
अपना अच्छा बुरा तक नहीं समझ पाने वाले और समाज में मै-वाद और इतनी बरबादी करने वाले, एक अजीब मानसिकता का शिकार रहने वाले अनेक लोगों को सिक्षा के नाम पर सर्टिफिकेट/प्रमाण-पत्र देने वाली शालाए (स्कूल) /इंस्टीट्यूट (संस्थाएं) क्या विकास है ?
जो प्राइवेट/निजी हो तो पैसे कमाने से मतलब रखती है और सरकारी हो तो बला टालने और वहां के अक्सर टीचर (गुरु जन) सरकारी वेतन भोगने से।
क्या है विकास अपनी नजर में?
मुफ्त अनाज की स्किमे ? या हर इंसान के पास सुकून का घर और पर भरने को सच में अनाज और ज़रूरी पोषक तत्व ?
जनता को क्या चाहिए? - सुकून चैन की ज़िंदगी? या लड़ने मारने के लिए दुश्मन ?
अपने देश में शांति या पड़ोसी देश में तबाही?
शैतान तो यही सिखाएगा, के दूसरो को बर्बाद करे बिना हम चैन से नहीं रह सकते ।
लेकिन इंसानियत ये है के अपने धर्म/मजहब का पालन करते हुए, किसी और के लिए कोई बैर दिल में ना रखना और सबको अपनी मर्ज़ी अनुसार अपने धर्म और मान्यताओं का पालन करने देना ।
हम तो तावतवार दोस्ती और कमज़ोर को दबाना बहादुरी समझ रहे है,
लेकिन अच्छाई तो कमज़ोर का साथ देना, माफ करना उससे दोस्ती करना है, और ताकतवर को भी खुश करने अपने अच्छाइयों के उसूल से ना फिरना है।
बड़ी सड़के , बड़ी गाडियां , बड़े घर और बड़े शहर, जिनमें कमज़ोर, गरीब और ज़रूरत-मंदो के लिए कोई जगह नहीं,
उन्हें इंसान ना समझना सिर्फ मजदूरी और घुलमी के लिए इस्तेमाल करना,
उन्हें अपने दिल में कमतर और छोटा जानना / सोचना
किसी का दर्द ना बाटना , उन्हें सरकार सस्ता चावल दाल से रही है तो बहुत बड़ा एहसान है उनके ऊपर ये सोचना,
और नेताओ का उन्हें बस लंबा लंबा भासं और आश्वासन देकर ,भगवान की बड़ी भावुक या उत्तेजक बाते करना, मंदिर बनाने और उन्हें यूहीं हमेशा सही शिक्षा, सही और पूरा इलाज, चिंता रहित, याने टेंशन फ्री ज़िंदगी से दूर/वंचित रखना सही है?
क्या यही विकास है?
या विकास क्या है?
ये मुझे आप बताइए?
कम से कम ख़ुदको बताइए, खुद से पूछिए ।।कुछ देर अकेले बैठ कर।
ज़रा सोचकर।
दो पल ज़िंदगी के यह भी देकर तो देखिए। ।।।
खुश रहिए।
(खुशियां फैलाइए माफ कीजिए।)
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